श्री सूत जी बोले – शौनक ! सुनो, मैं तुम्हारे सामने एक अन्य गोपनीय कथा का वर्णन करूंगा, क्योंकि तुम शिव भक्तों में अग्रगण्य व वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ हो ।
समुद्र के निकटवर्ती प्रदेश में वाष्कल नामक गांव है, जहां वैदिक धर्म से विमुख महापापी मनुष्य रहते हैं । वे सभी दुष्ट हैं एवं उनका मन दूषित विषय भोगों में ही लगा रहता है। वे देवताओं एवं भाग्य पर विश्वास नहीं करते। वे सभी कुटिल वृत्ति वाले हैं। किसानी करते हैं और विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र रखते हैं। वे व्यभिचारी हैं। वे इस बात से पूर्णतः अनजान हैं कि ज्ञान, वैराग्य तथा सद्धर्म ही मनुष्य के लिए परम पुरुषार्थ हैं। वे सभी पशुबुद्धि हैं।
अन्य समुदाय के लोग भी उन्हीं की तरह बुरे विचार रखने वाले, धर्म से विमुख हैं। वे नित्य कुकर्म में लगे रहते हैं एवं सदा विषयभोगों में डूबे रहते हैं। वहां की स्त्रियां भी बुरे स्वभाव की, स्वेच्छाचारिणी, पाप में डूबी, कुटिल सोच वाली और व्यभिचारिणी हैं। वे सभी सद्व्यवहार तथा सदाचार से सर्वथा शून्य हैं। वहां सिर्फ दुष्टों का निवास है।
वाष्कल नामक गांव में बिंदुग नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह अधर्मी, दुरात्मा एवं महापापी था। उसकी स्त्री बहुत सुंदर थी। उसका नाम चंचुला था। वह सदा उत्तम धर्म का पालन करती थी परंतु बिंदुग वेश्यागामी था । इस तरह कुकर्म करते हुए बहुत समय व्यतीत हो गया। उसकी स्त्री काम से पीड़ित होने पर भी स्वधर्मनाश के भय से क्लेश सहकर भी काफी समय तक धर्म भ्रष्ट नहीं हुई। परंतु आगे चलकर वह भी अपने दुराचारी पति के आचरण से प्रभावित होकर, दुराचारिणी और अपने धर्म से विमुख हो गई ।
इस तरह दुराचार में डूबे हुए उन पति-पत्नी का बहुत सा समय व्यर्थ बीत गया। वेश्यागामी, दूषित बुद्धि वाला वह दुष्ट ब्राह्मण बिंदुग समयानुसार मृत्यु को प्राप्त हो, नरक में चला गया। बहुत दिनों तक नरक के दुखों को भोगकर वह मूढ़ बुद्धि पापी विंध्यपर्वत पर भयंकर पिशाच हुआ। इधर, उस दुराचारी बिंदुग के मर जाने पर वह चंचुला नामक स्त्री बहुत समय तक पुत्रों के साथ अपने घर में रहती रही।
पति की मृत्यु के बाद वह भी अपने धर्म से गिरकर पर पुरुषों का संग करने लगी थी । सतियां विपत्ति में भी अपने धर्म का पालन करना नहीं छोड़तीं। यही तो तप है। तप कठिन तो होता है, लेकिन इसका फल मीठा होता है। विषयी इस सत्य को नहीं जानता इसीलिए वह विषयों के विषफल का स्वाद लेते हुए भोग करता है।
एक दिन दैवयोग से किसी पुण्य पर्व के आने पर वह अपने भाई-बंधुओं के साथ गोकर्ण क्षेत्र में गई। उसने तीर्थ के जल में स्नान किया एवं बंधुजनों के साथ यत्र-तत्र घूमने लगी । घूमते-घूमते वह एक देव मंदिर में गई। वहां उसने एक ब्राह्मण के मुख से भगवान शिव की परम पवित्र एवं मंगलकारी कथा सुनी।
कथावाचक ब्राह्मण कह रहे थे कि ‘जो स्त्रियां व्यभिचार करती हैं, वे मरने के बाद जब यमलोक जाती हैं, तब यमराज के दूत उन्हें तरह- तरह से यंत्रणा देते हैं। वे उसके कामांगों को तप्त लौह दण्डों से दागते हैं। तप्त लौह के पुरुष से उसका संसर्ग कराते हैं। ये सारे दण्ड इतनी वेदना देने वाले होते हैं कि जीव पुकार -पुकार कर कहता है कि अब वह ऐसा नहीं करेगा। लेकिन यमदूत उसे छोड़ते नहीं । कर्मों का फल तो सभी को भोगना पड़ता है। देव, ऋषि, मनुष्य सभी इससे बंधे हुए हैं।’
ब्राह्मण के मुख से यह वैराग्य बढ़ाने वाली कथा सुनकर चंचुला भय से व्याकुल हो गई। कथा समाप्त होने पर सभी लोग वहां से चले गए, तब कथा बांचने वाले ब्राह्मण देवता से चंचुला ने कहा – हे ब्राह्मण ! धर्म को न जानने के कारण मेरे द्वारा बहुत बड़ा दुराचार हुआ है।
स्वामी! मेरे ऊपर कृपा कर मेरा उद्धार कीजिए। आपके प्रवचन को सुनकर मुझे इस संसार से वैराग्य हो गया है । मुझ मूढ़ चित्तवाली पापिनी को धिक्कार है। मैं निंदा के योग्य हूं। मैं बुरे विषयों में फंसकर अपने धर्म से विमुख हो गई थी। कौन मुझ जैसी कुमार्ग में मन लगाने वाली पापिनी का साथ देगा? जब यमदूत मेरे गले में फंदा डालकर मुझे बांधकर ले जाएंगे और नरक में मेरे शरीर के टुकड़े करेंगे, तब मैं कैसे उन महायातनाओं को सहन कर पाऊंगी? मैं सब प्रकार से नष्ट हो गई हूं, क्योंकि अभी तक मैं हर तरह से पाप में डूबी रही हूं। हे ब्राह्मण! आप मेरे गुरु हैं, आप ही मेरे माता-पिता हैं। मैं आपकी शरण में आई हूं। मुझ अबला का अब आप ही उद्धार कीजिए ।
सूत जी कहते हैं – शौनक, इस प्रकार विलाप करती हुई चंचुला ब्राह्मण देवता के चरणों में गिर पड़ी। तब ब्राह्मण ने उसे कृपापूर्वक उठाया ।
यह कथा एक गहन नैतिक और आध्यात्मिक संदेश देती है, जो व्यक्ति के पापों से मुक्ति, पश्चाताप, और भगवान शिव की कृपा के महत्व पर जोर देती है।
कथा का सारांश
- वाष्कल गांव की नष्ट हो चुकी स्थिति:
- वाष्कल नामक गांव में लोग अधर्मी और दुष्ट थे। वे विषयों में लिप्त रहते हुए अपनी बुद्धि को भ्रष्ट कर चुके थे।
- वहां का ब्राह्मण बिंदुग भी महापापी था, जो न केवल धर्म से विमुख था, बल्कि व्यभिचार में भी लिप्त था।
- चंचुला का पतन और पश्चाताप:
- बिंदुग की पत्नी चंचुला, जो पहले धर्म का पालन करती थी, अपने पति के दुष्कर्मों से प्रभावित हो गई और उसने भी धर्म से विमुख होकर पाप कर्मों को अपनाया।
- जैसे ही बिंदुग की मृत्यु हुई और वह नरक में गया, चंचुला भी पापों की राह पर चलने लगी।
- एक दिन, पुण्यकर्म के कारण वह गोकर्ण क्षेत्र में आई और वहां भगवान शिव की कथा सुनी।
- ब्राह्मण की कथा और चंचुला का पश्चाताप:
- कथा में बताया गया कि जो स्त्रियां व्यभिचार करती हैं, वे यमलोक में जाने पर यमराज के दूतों द्वारा भयंकर यातनाएं भोगती हैं।
- इस कथा से चंचुला भयभीत हो गई और उसने अपने पापों का घोर पश्चाताप किया।
- वह ब्राह्मण से विनती करती है कि वह उसे उद्धार करें, क्योंकि अब उसे अपने कर्मों का अहसास हो चुका था।
- ब्राह्मण का उदारता और चंचुला का उद्धार:
- चंचुला ने ब्राह्मण के चरणों में गिरकर अपनी गलती स्वीकार की और उनके मार्गदर्शन की प्रार्थना की।
- ब्राह्मण ने उसकी विनती स्वीकार की और उसे उद्धार का मार्ग दिखाने का वचन दिया।
कथा का शिक्षाप्रद संदेश
- पापों से मुक्ति:
- इस कथा से यह सिद्ध होता है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी पापी क्यों न हो, अगर सच्चे मन से पश्चाताप करता है और भगवान की शरण में जाता है, तो उसे मुक्ति मिल सकती है।
- पश्चाताप और सच्ची भक्ति से जीवन की गलतियों का सुधार संभव है।
- व्यभिचार और पाप का फल:
- जो व्यक्ति व्यभिचार या अन्य पापों में लिप्त रहते हैं, वे अंततः यमराज की यातनाओं का सामना करते हैं।
- इस कथा में यह स्पष्ट किया गया है कि पापों का फल निश्चित रूप से भोगना पड़ता है, और यह जीवन की कठिनाइयों और दु:खों का कारण बनता है।
- धर्म और वैराग्य का महत्व:
- चंचुला ने भगवान शिव की कथा से वैराग्य और धर्म का महत्व समझा और आत्मसुधार की दिशा में कदम बढ़ाया।
- यह दिखाता है कि धर्म का पालन और वैराग्य जीवन में शांति और सुख की प्राप्ति का मार्ग हैं।
- भगवान की कृपा:
- यह कथा भगवान शिव की असीम कृपा का प्रतीक है, जो अपने भक्तों के पापों को क्षमा कर उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।
- किसी भी व्यक्ति को यदि दिल से भगवान शिव की भक्ति और सत्य मार्ग पर चलने का संकल्प हो, तो भगवान शिव उसकी सहायता करते हैं और उसे सही दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
निष्कर्ष
यह कथा दर्शाती है कि व्यक्ति चाहे जितना भी पापी क्यों न हो, अगर वह सच्चे दिल से पश्चाताप करता है और अपने पापों को छोड़कर धर्म और भक्ति की राह पर चलता है, तो भगवान उसकी सहायता करते हैं। इस मार्ग पर चलने से कोई भी व्यक्ति अपने पापों से मुक्ति पा सकता है और अंततः भगवान शिव की कृपा से मोक्ष प्राप्त कर सकता है।