ब्रह्मा और विष्णु द्वारा शिव की स्तुति करना – उन्नीसवां अध्याय

ब्रह्माजी कहते हैं: नारद! कन्यादान करके दक्ष ने भगवान शिव को अनेक उपहार प्रदान किए। उन्होंने सभी ब्राह्मणों को भी दान-दक्षिणा दी। तत्पश्चात भगवान विष्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी जी सहित…

Continue Readingब्रह्मा और विष्णु द्वारा शिव की स्तुति करना – उन्नीसवां अध्याय

शिव और सती का विवाह – अठारहवां अध्याय

ब्रह्माजी बोले: नारद! जब मैं कैलाश पर्वत पर भगवान शिव को प्रजापति दक्ष की स्वीकृति की सूचना देने पहुंचा तो वे उत्सुकतापूर्वक मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। तब मैंने…

Continue Readingशिव और सती का विवाह – अठारहवां अध्याय

सती को शिव से वर की प्राप्ति – सत्रहवां अध्याय

्रह्माजी कहते हैं:हे नारद! सती ने आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को उपवास किया। नंदाव्रत के पूर्ण होने पर जब वे भगवान शिव के ध्यान में मग्न थीं…

Continue Readingसती को शिव से वर की प्राप्ति – सत्रहवां अध्याय

रुद्रदेव का सती से विवाह – सोलहवां अध्याय

्रह्माजी बोले: श्रीविष्णु सहित अनेक देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों द्वारा की गई स्तुति सुनकर सृष्टिकर्ता शिवजी ने प्रसन्नतापूर्वक हम सबके आगमन का कारण पूछा। रुद्रदेव बोले- हे हरे! हे देवताओ और…

Continue Readingरुद्रदेव का सती से विवाह – सोलहवां अध्याय

सती की तपस्या – पंद्रहवां अध्याय

्रह्माजी बोले: हे नारद! एक दिन मैं तुम्हें लेकर प्रजापति दक्ष के घर पहुंचा। वहां मैंने देवी सती को उनके पिता के पास बैठे देखा। मुझे देखकर दक्ष ने आसन…

Continue Readingसती की तपस्या – पंद्रहवां अध्याय

दक्ष की साठ कन्याओं का विवाह – चौदहवां अध्याय

ब्रह्माजी बोले: हे मुनिराज! दक्ष के इस रूप को जानकर मैं उसके पास गया। मैंने उसे शांत करने का बहुत प्रयत्न किया और सांत्वना दी। मैंने उसे तुम्हारा परिचय दिया।…

Continue Readingदक्ष की साठ कन्याओं का विवाह – चौदहवां अध्याय

दक्ष द्वारा मैथुनी सृष्टि का आरंभ – तेरहवां अध्याय

ब्रह्माजी कहते हैं: हे नारद! प्रजापति दक्ष देवी का वरदान पाकर अपने आश्रम में लौट आए। मेरी आज्ञा पाकर प्रजापति दक्ष मानसिक सृष्टि की रचना करने लगे परंतु फिर भी…

Continue Readingदक्ष द्वारा मैथुनी सृष्टि का आरंभ – तेरहवां अध्याय

दक्ष की तपस्या – बारहवां अध्याय

नारद जी ने पूछा: हे ब्रह्माजी! उत्तम व्रत का पालन करने वाले प्रजापति दक्ष ने तपस्या करके देवी से कौन-सा वरदान प्राप्त किया? और वे किस प्रकार दक्ष की कन्या…

Continue Readingदक्ष की तपस्या – बारहवां अध्याय

ब्रह्माजी की काली देवी से प्रार्थना – ग्यारहवां अध्याय

नारद जी बोले: पूज्य पिताजी! विष्णुजी के वहां से चले जाने पर क्या हुआ? ब्रह्माजी कहने लगे कि जब भगवान विष्णु वहां से चले गए तो मैं देवी दुर्गा का…

Continue Readingब्रह्माजी की काली देवी से प्रार्थना – ग्यारहवां अध्याय

ब्रह्मा-विष्णु संवाद – दसवां अध्याय

ब्रह्माजी बोले: नारद ! काम के चले जाने पर श्री महादेव जी को मोहित कराने का मेरा अहंकार गिरकर चूर-चूर हो गया परंतु मेरे मन में यही चलता रहा कि…

Continue Readingब्रह्मा-विष्णु संवाद – दसवां अध्याय

ब्रह्मा का शिव विवाह हेतु प्रयत्न – नवां अध्याय

ब्रह्माजी बोले: काम ने प्राणियों को मोहित करने वाला अपना प्रभाव फैलाया। बसंत ने उसका पूरा सहयोग किया। रति के साथ कामदेव ने शिवजी को मोहित करने के लिए अनेक…

Continue Readingब्रह्मा का शिव विवाह हेतु प्रयत्न – नवां अध्याय

काम की हार – आठवां अध्याय

सूत जी बोले: हे ऋषियो! जब इस प्रकार प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा, तब उनके वचनों को सुनकर नारद जी आनंदित होकर बोले- हे ब्रह्मन्! मैं आपको बहुत धन्यवाद देता हूं…

Continue Readingकाम की हार – आठवां अध्याय

संध्या की आत्माहुति – सातवां अध्याय

ब्रह्माजी कहते हैं: नारद! जब भगवान शिव देवी संध्या को वरदान देकर वहां से अंतर्धान हो गए, तब संध्या उस स्थान पर गई, जहां पर मुनि मेधातिथि यज्ञ कर रहे…

Continue Readingसंध्या की आत्माहुति – सातवां अध्याय

संध्या की तपस्या – छठा अध्याय

ब्रह्माजी बोले: हे महाप्रज्ञ नारद! तपस्या की विधि बताकर जब वशिष्ठ जी चले गए, तब संध्या आसन लगाकर कठोर तप शुरू करने लगी। वशिष्ठ जी द्वारा बताए गए विधान एवं…

Continue Readingसंध्या की तपस्या – छठा अध्याय

संध्या का चरित्र – पांचवां अध्याय

सूत जी बोले: हे ऋषियो! नारद जी के इस प्रकार प्रश्न करने पर ब्रह्माजी ने कहा : मुने! संध्या का चरित्र सुनकर समस्त कामनियां सती-साध्वी हो सकती हैं। वह संध्या…

Continue Readingसंध्या का चरित्र – पांचवां अध्याय

काम-रति विवाह – चौथा अध्याय

नारद जी ने पूछा: हे ब्रह्माजी! इसके पश्चात क्या हुआ? आप मुझे इससे आगे की कथा भी बताइए। भगवन् काम और रति का विवाह हुआ या नहीं? आपके शाप का…

Continue Readingकाम-रति विवाह – चौथा अध्याय